गर्भाशय कैन्सर का उपचार

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गर्भाशय कैन्सर का उपचार

विश्व की सर्वाधिक प्राचीन चिकित्सा व्यवस्था का ऋग्वेद में उल्लेख है, जिसमें भी कैन्सर की शल्य क्रिया, औषधी उपचार का वर्णन है ।  विज्ञान की प्रगति के साथ ही कैन्सर के उपचार की नवीन तकनीके विकसति हुई है ।  85% से ज्यादा कैन्सर को जड़ से खत्म किया जा सकता है ।  कैन्सर के उपचार के लिए मुख्यतः तीन विधियां है –

  1. विकिरण उपचार
  2. औषधि उपचार
  3. शल्य क्रिया

प्रायः तीनों की पद्धतियां उपचार में प्रयुक्त होती है ।  कैन्सर की प्रारंभिक अवस्था में शल्य क्रिया संभव है परन्तु शल्य क्रिया के बादभी अवशेष रहने की प्रबल संभावना रहती है ।  ऐसी स्थिति में शल्य क्रिया के पश्चात् विकिरण एवं औषधि उपचार की आवश्यकता रहती ही है । 

विकिरण उपचार का बहुत महत्व है ।  विकिरण उच्च ऊर्जा युक्त किरणें होती है । ये दिखाई नहीं देती हैं परन्तु शरीर में कैंसर युक्त भाग में प्रवेश करने पर तेज गति से विभाजित होने वाली कोशिका को जला देती है ।  विकिरण की यह विशेषता होती है कि शरीर की सामान्य कोशिकाओं को अपेक्षाकृत कम नुकसान पहुंचाती है ।  विकिरण उपचार के लिए टेली थेरेपी अधिक प्रचलन में है ।  इसमें रेडियोएक्टिव कोबाल्ट (Cobalt) का उपयोग होता है ।  अंग विशेष एवं कैन्सर के प्रकार के आधार परविकिरण की मात्रा तय करने से अधिकतम 40 दिनों में, सप्ताह में पांच बार प्रतिदिन, 2-4 मिनट के हिसाब से उपचार किया जाता है ।  ब्रेकी थेरेपी (Braky Thearepy) विकिरण की नवीन तकनीकी है इससे अंग विशेष में अत्यन्त नजदीक से विकिरण द्वारा उपचारित किया जाता है ।  Liner Accelerator (लीनीयर एक्सीलरेटर) नामक विकिरण मशीन से अत्यन्त संयमित फोटोन (Photon) का उपयोग किया जाता है ।  आजकल अल्प अवधि रेडियो आरसोटोप (Radio Arsotop) भी विकसित किये गए हैं, जो शरीर में मुंह अथव इंजेक्शन के माध्यम से पहुंचा दिए जाते हैं एवं कैन्सर अंग में संग्रहित हो जाते है एवं कैन्सर कोशिकाओं को अपने विकिरण से नष्ट कर देते है ।  इस उपचार में विकिरण तत्वों के साथ कैन्सर की Chemotherapy (कीमोथेरेपी) औषधि जोड़कर इनकी प्रभावित क्षमता को और भी बढ़ा सकते है ।  इसे रेडियो थैरेपी कहते है ।

कैन्सर के उपचार में कीमा थैरेपी (Chemotherapy) का काफी महत्व है ।  इस विधि में विभिन्न प्रकार की कैन्सर रोधी औषधियां इंजेक्शन के माध्यम से शरीर में पहुंचाई जाती है ।  मुंह से भी देने योग्य औषधियां उपलब्ध हो रही है ।  प्रायः दो या अधि औषधियों का समूह एक से पांच दिन तक एक ही क्रम में दी जाती है ।  इस प्रकार के क्रम प्रत्येक 15 अथवा 21 दिन में पुनः दिये जाते है ।  ऐसे ही 5 – 7 क्रम देने पर कैन्सर पर काफी नियन्त्रण हो सकता है । शल्य क्रिया से पहले भी कुछ Chemotherapy देकर कैन्सर कोशिकाओं का समूह कम किया जा सकता है ।  कैन्सर शल्य क्रिया के बाद एवं विकिरण उपचार से पहले Chemotherapy देने के भी काफी लाभ है। इससे अल्प मात्रा में शरीर में फैली हुई कैंसर कोशिकाए नष्ट की जा सकती है। कीमोथैरेपी के कुछ विपरित तात्कालित रूप में उल्टी जैसा अनुभव करना एंव जिनमें बालो का झड़ना एंव रक्त कोशिकाओं में कमी होना प्रमुख है परन्तु ये विपरीत प्रभाव पूर्णतः नियंत्रण योग्य है। कीमोथैरेपी बन्द करने पर शरीर पर पुनः बाल उग जाते है एवं रक्त भी सामान्य हो जाता है।

शल्य चिकित्सा:

महिलाओ को कैंसर से भयग्रस्त नहीं होना चाहिए। प्रारम्भिक लक्षण दिखते ही शीघ्र उपचार करवाएं। शीघ्र व त्वरित उपचार से देश एंव परिवार दोनों का ही लाभ है। उपचार से रोगी का शीघ्र जीवन अच्छा हो जाता है।

गर्भाशय में कैंसर से बचने के लिए महिलाओ को इन सावधानियो को बरतना चाहिए-

  • किसी भी तरह की बर्थ इंजरी का पूरा इलाज होना चाहिए।
  • किसी भर तरह कि असामाान्य तरल स्राव की पूर्ण जांच करवानी चाहिए।
  • 25 वर्ष की उम्र के बाद हर तीसरे या पांच साल के अन्तराल से पेप स्मीयर की जांच करवानी चाहिए।
  • 35 वर्ष की उम्र के बाद ही साल पेप स्मीयर की जांच करवानी चाहिए।
  • माहवारी के बन्द होने के बाद असामान्य रक्तस्राव की सम्पूर्ण रूप से जांच करवानी चाहिए।
  • हरे एंव पीले ताले फलो व सब्जियो का सेवन करना चाहिए।
  • हारमोन्स का प्रयोग न करें।
  • लैंगिक स्वच्छता पर जांेर दें।
  • परिवार नियोजन को अपनायें।
  • कैंसर छूत की बीमारी नहीं हैं इसलिए एक-दूसरे से नहीं फैलती।

कम उम्र की महिलाओं में मुख कैसंर या ग्रीवा कैंसर रोग ग्रस्त को शल्य चिकित्सा से निकाल दिया जाता है। अधिक उम्र की महिलाओं में जिनके बच्चें हों, पूरा गर्भाश्य शल्य क्रिया से निकाल दिया जाता है। गर्भाश्य के अन्दर के कैंसर में पूरा गर्भाश्य निकालना आवश्यक होता है। गर्भाशय कैंसर में प्राथमिक स्तर पर यदि आयुर्वेदिक औषधियों का सेवन यदि योग्यता चिकित्सक की देखरेख में किया जाए तो संभवत यह ठीक भी हो सकता है इसके लिए आहार व्यवहार परहेज एवं रोगी की इच्छा शक्ति का बड़ा योगदान रहता है |

– डॉ. प्रीति गुप्ता

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About the Author: Pushti Mimansa