Daan ka Shastriya Swroop

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दान का शास्त्रीय स्वरूप

मनुष्य का जीवन कर्मप्रधान है और कर्मेन्द्रियों में हाथ का महत्वपूर्ण स्थान है; क्योंकि मनुष्य जीवन में अधिकांश कार्य हाथ से ही सम्पादित होते हैं और इन हाथों की वास्तविक शोभा किसमें है, इस बात का विचार किया जाये  तो नीतिशास्त्रों के अनुसार हाथ की शोभा मात्र आभूषण पहनना न होकर दानशील बने रहना-

‘दानेन पार्णिन तु कंकणेन।’

दान के बारे में विचार किया जाय तो देखते हैं कि दान एक सामान्य क्रिया अथवा परम्परा नहीं है, अपितु दान वह तत्व है, जिसके द्वारा धन की उसी प्रकार शुद्धि होती है, जिस प्रकार स्नान से शरीर की शुद्धि। इसीलिये स्मतिकारों ने गृहस्थों के लिये मुख्य कर्म के तौर पर दान को उल्लेखित किया है-

यतीनां तु शमो धर्मस्त्वनाहारो वनौकसाम्।
दानमेकं गृहस्थानां शुश्रूषा ब्रह्मचारिणाम्।।

इस बात की शिक्षा स्वयं भगवान् ने मनुष्य अवतार धारण करके भी दी है। भगवान् श्रीकृष्ण का अवतरण भले ही कारागार की विषम परिस्थितियों में हुआ हो, परंतु भगवान के जन्मोत्सव की प्रसन्नता में वासुदेव जी (कारागार के बन्धन के कारण दान करने में असमर्थता के कारण) दस हजार गायों के दान का मन में ही संकल्प करते हैं-

‘कृष्णावतारोत्सवसम्प्रमोऽस्पृशन्
मुदा द्विजेभ्योऽयुतमाप्लुतो गवाम्।।’

गोदान के इस मानसिक संकल्प को वे कसंवध के पश्चात् पूरा करते हैं। महामति वसूदेव जी ने भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम जी के जन्म-नक्षत्र में जितनी गौएँ मन ही मन संकल्प करके दी थीं, उन्हें कंस ने अन्याय से छीन लिया था, अब उनका स्मरण करके उन्होंने ब्राह्मणों को वे फिरसे दीं-

याः कृष्णरामजन्मेक्र्षे मनोदत्ता महामतिः।
ताश्चाददादनुस्मृत्य  कंसेनाधर्मतो ह्यताः।।

व्रज में श्रीकृष्णजन्मोत्सव के निमित्त नन्दराय जी ने भी अपार दान किया और वस्त्र तथा आभूषणों से सुसज्जित दो लाख गौएं दान में दीं-

 ‘धेनूनां नियते प्रादाद् विप्रेभ्यः समलड्.कृते।’

स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण भी द्वारका में रहते हुए नित्यप्रति दान करते थे, जिसका वर्णन श्रीशुकदेव जी महाराज ने श्रीमöागवत(10/70/9)-में किया है-

ददौ रूप्यखुराग्राणां क्षौमाजिनतिलैः सह।
अलड्.कृतेभ्यो विप्रेभ्यो बद्वं बद्वं दिने दिने।।

अर्थात् वे ब्राह्मणों को वस्त्राभुषणों से सुसज्जित करके रेशमी वस्त्र, मृगचर्म और तिलके साथ प्रतिदिन तेरह हजार चैरासी ऐसी गायों का दान करते थे, जिनकी सींगे सोने से और खुर चाँदी से मढ़े होते थे।

इसी प्रकार देवर्षि नारद जब भगवान् की गृहस्थलीला के दर्शन के लिये द्वारका आते हैं तो वे श्रीकृष्ण को श्रेष्ठ ब्राह्मणों को वस्त्राभूषणों से सुसज्जित गौ ओं का दान करते हुए देखते हैं-

‘कुत्रचिद् द्विजमुख्येभ्यो ददतं गाः स्वलड्.कृताः।।’

स्वयं भगवान् की उपर्युक्त दिनचर्या से स्पष्ट है कि दान करना मनुष्य मात्र के लिये परम आवश्यक कर्म है, निर्धन व्यक्ति यदि अभाव के कारण दान नहीं कर पाये तो बात दूसरी हैं, किंतु धनवान् को तो प्रतिक्षण दानशील बने रहना चाहिये। महाभारत के अनुसार तो उस धनवान् व्यक्ति को जो दान नहीं करता और उस दरिद्र का जो परिश्रम नहीं करता; गले में दृढ़ पत्थर बाँधकर डुबो देना चाहिये-

द्वावम्भसि निवेष्टव्यौ गले बध्वा दृढां शिलाम्।
धन्वन्तमदातारं     दरिद्रं   चातपस्विनम्।।

स्मृतियों के अनुसार भी धार्मिक जीवन के प्रमुख रूप में दान को कलियुग में विशेष रूप से महत्व प्राप्त है-

तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते।
द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेकं कलौ युगे।

अर्थात् सत्ययुग में तप, त्रेता में ज्ञान, द्वापर में यज्ञ और कलि में केवल दान को महर्षियों ने प्रधान धर्म कहा है।

दान की चर्चा करते हुए यहाँ एक बात का उल्लेख करना भी प्रासंगिक होगा कि शास्त्रों में जहाँ दान का विधान विस्तार से दिया है, वहाँ कुछ वर्जनाओं का भी उल्लेख प्राप्त होता है। संक्षेप मंे उन पर दृष्टिपात करना समीचीन ही होगा, उनमें कुछ इस प्रकार हैं-

अधिकार- कोई भी कार्य तभी करना चाहिये जब उसका अधिकार (शास्त्रीय दृष्टि में) प्राप्त हो, अतः बिना अधिकार के कोई कार्य नहीं करना चाहिये। यही बात दान के संदर्भ में भी कही गयी है। शास्त्रों मंे अनधिकार दान को अप्रामाणिक दान के नाम से भी उल्लेखित किया गया है। अप्रामाणिक दान में कुछ प्रमुख हैं- भावावेश (अत्यधिक प्रसन्नता या क्रोध के कारण उत्पन्न विचारहीनता की स्थिति), भयभीत होकर, रूग्णावस्था में, अल्पावस्था में, मूर्खतावश, नशे की स्थिति में या पागलपन की अवस्था में दान का अधिकार नहीं हैं-

‘क्रुद्धहष्टभीतार्तलुब्धबालस्थविरमूढमत्तोन्मत्त- वाक्यान्यनृतान्यपातकानि।’

इसी प्रकार अपने परिवार के भरण-पोषण का चिवार किये बिना दान देने का भी स्पष्ट निषेध है।

दान लेने के अधिकारी- दान की सफलता व असफलता में दानग्रहीता के पात्र-कुपात्र होने का भी बहुत बड़ा योगदान होता हैं। अतः दान देने के सम्बन्ध में शास्त्रों ने अनधिकारी के लिये दान का स्पष्ट निषेध ही नहीं किया है, अपितु कई स्थलों पर तो अनधिकारी के लिये दिये दान से पुण्य के स्थान पर पाप का उल्लेख प्राप्त होता है-

यथा प्लवेनौपलेन निमज्जत्युदके तरन्।
तथा निमज्जतोऽधस्तादज्ञौ दातृप्रतीच्छकौ।।

अर्थात् जिस प्रकार पानी में पत्थर की नाव से तैरता हुआ व्यक्ति उस नाव के साथ ही डूब जाता है, उसी प्रकार मूर्ख दान लेनेवाला तथा दानकर्ता-दोनों नरक में डूबते हैं।

इसी प्रकार धूम्रपानरत व्यक्ति को दान देने के फल के विषय में कहा गया है कि देने वाले को नरक की प्राप्ति होती है और ग्रहीता ब्राह्मण ग्रामशूकर होता है-

 ‘दाता तु नरकं याति ब्राह्मणों ग्रामसूकर।’

दान के ग्रहण करने वाले व्यक्ति के द्वारा दान से प्राप्त धन के उपयोग के आधार पर भी शुभत्व-अशुत्व निर्भर है। जैसे शराबी-जुआरी आदि को दिया हुआ दान सत्कर्म न होकर उनको शराब या जुआ आदि दुष्कर्म में लगाने में साधक होने के कारण दाता को उक्त दुष्कर्म में सहायता का दोष प्राप्त होता है। अतः दान देते समय दान के निमित्त सम्पात्र का विचार अवश्य करना चाहिये। इसी भावना के आधार पर श्रीमöागवत में तीर्थ के विधान में भी उन्हीं तीर्थों का विधान किया गया है, जहाँ सत्पात्र प्राप्त होतें है। ‘स वै पुण्यतमो देशः सत्पात्रं यत्र लभ्यते।’ अतः दान सत्पात्र को ही देना चाहिये, कुपात्र को नहीं; क्योंकि सत्पात्र को दिया दान जहाँ अनन्त फलदायी है, वहीं कुपात्र को दिया दान निष्फल होता हैं।

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About the Author: Pushti Mimansa