दान क्यों और कैसें ? – Daan Kyon or Kaise?

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मनुष्य के जीवन में दान का अत्यधिक महत्व बतलाया गया है, यह एक प्रकार का नित्यकर्म है ।  मनुष्य को प्रतिदिन कुछ दान अवश्य करना चाहिये –

श्रद्धया देयम्, हिया देयम, भिया देयम्‘ दान चाहे श्रद्धा से दे अथवा लज्जा से दे या भय दे, परन्तु दान किसी भी प्रकार अवश्य देना चाहिये ।  मानव जाति के लिये दान परम आवश्यक है ।  दान के बिना मानव की उन्नति अवरूद्ध हो जाती है ।  इस प्रसंग में एक कथा आती है – एक बार देवता, मनुष्य और असुर तीनो की उन्नति अवरूद्ध हो गई अतः वे सब पितामह प्रजापति ब्रह्माजी के पास गये और अपना दुःख दूर करने के लिये उनकी प्रार्थना करने लगे। प्रजापति ब्रह्मा ने तीनों को मात्र एक अक्षर का उपदेश दिया-’द’। स्वर्ग में भोगों के बाहुल्य से भाग ही देवलोक का सुख माना गया है, अतः देवगण कभी वृद्ध न होकर सदा इन्द्रिय भोग भोगने में लगे रहते हैं। उनकी इस अवस्था पर विचार कर प्रजापति ने देवताओं को ’द’ के द्वारा दमन-इन्द्रियदमन का उपदेश दिया। ब्रह्मा के इस उपदेश से देवगण अपने को कृतकृत्य मानकर उन्हें प्रणाम कर वहाँ से चले गये।

असुर स्वभाव से ही हिंसा-वृतिवाले होते हैं, क्रोध और हिंसा उनका नित्य का व्यापार हैं, अतएव प्रजापति ने उन्हें इस दुष्कर्म से छुडा़ने के लिये ’द’ के द्वारा जीवमात्र पर ’दया’ करने का उपदेश दिया। असुरगण ब्रह्मा की इस आज्ञा को शिरोधार्य कर वहाँ से चले गये।

मनुष्य, कर्मयोनि होने के कारण सदा लोभवश कर्म करने और अर्थसंग्रह में ही लगे रहते हैं। असलिये प्रजापति ने लोभी मनुष्यों को ’द’ के द्वारा उनके कल्याण के लिये ’दान’ करने का उपदंेश किया। मनुष्यगण भी प्रजापति की आज्ञा करे स्वीकार कर सफल-मनोरथ होकर उन्हें प्रणाम कर वहां से चले गये। अतः मानव को अपने अभ्युदय के लिये दान अवश्य करना चाहिए।

विभवो दानशक्तिश्च महतां तपसां फलम्।

विभच और दान देने की सामथ्र्य अर्थात मानसिक उदारता-ये दोनो महान् तपके ही फल हैं। विभव होना तो सामान्य बात है। यह तो कहीं भी हों सकता हंै, पर उस विभव को दूसरों के लिये देना यह मन की उदारता पर ही निर्भर करता हैं, जो जन्म-जन्मातंर के पुण्य-पुज्´ से प्राप्त होता है।

महाराज युद्धिष्ठिर के समय की एक घटना है- एक बा्रह्मण देवता के पिता का देहान्त हो गया। उनके मन में यह भाव आया कि मैं अपने पिता का दाह संस्कार चंन्दन की चिता पर करूं। पर उनके पास चन्दन की लकडी का अभाव था। वे राजा युद्धिष्ठिर के पास गये और उनसे सारा वृतान्त बताकर पिता के दाह संस्कार के निमित चंन्दन काष्ठ की याचना की। महाराज युद्धिष्ठिर के पास चंन्दन काष्ठ की कोई कमी नहीं थी तथा ऐसे समय में वे उन ब्राह्मण को देना भी चाहते थे परन्तु उस समय अनवरत वर्षा होने के कारण सम्पूर्ण काष्ठ भीग चुकी थीं। गीली लकड़ी से दाह संस्कार नहीं हों सकता था, अतः उन्हें वहां से निराश लौटना पड़ा। इसके अनन्तर वे इसी कार्य के निमित राजा कर्ण के पास पहुचें। राजा कर्ण के सामने भी ठीक वहींे परिस्थिति थी। अनवरत वर्षा होने के कारण सम्पूर्ण काष्ठ गीले हो चुके थे। परंतु पितृदाह के लिये चन्दन की सुखी लकडी की आवश्यकता थी। कर्ण ने यह निर्णय लिया कि उनका सिंहासन चन्दन की लकडी से बना हुआ हैं, जो एकदम सुखा हैं। अतः उन्होंने कारीगरों को बुलाकर सिंहासन से काष्ठ निकालने का तत्काल आदेश दिया और इस प्रकार उन ब्राह्मण के पिता का दाह-संस्कार चन्दन की चिता पर सम्पन्न हो सका। चन्दन के काष्ठ का सिंहासन महाराज युद्धिष्ठिर के पास भी था, पर यह सामयिक ज्ञान और मन की उदारता उन्हें प्राप्त न थी, जिसके कारण वे हइस दान से वंचित रह गये और यह श्रेय कर्ण को ही प्राप्त हो सका। इसीलिये कर्ण को ’दानवीर’ की उपाधि भी प्राप्त हुई।

शास्त्रों में दान के लिये स्थान, काल और पात्र को विस्तृत विचार किया गया है। दान किसी भी शुभ स्थान पर अर्थात तीर्थ आदि में शुभकाल में , अच्छे मुहूर्त में सत्पात्र को देना चाहिए। यद्यपि यह विचार सर्वथा उचित है, परन्तु अनवसर में भी यदि अवसर प्राप्त जाय तो भी दान का अपना एक वैशिष्टय है’ जिस पात्र को आवश्यकता है, जिस स्थान पवर आवश्यकता है और जिस काल में आवश्यकता है, उसी क्षण देने का एक अपना विशेष महत्व है। विशेष आपतिकाल में तत्क्षण पीड़ित समुदाय को अन्न, आवास, भूमि आदि की जो सहायता प्रदान की जाती हैं, वह इसी कोटि का दान है। यह दान व्यक्तिगत और सामूहिक दोनो प्रकार से होता है।

सामान्यतः न्यायपूर्वक अर्जित किये हुए धन का दशमांश बुद्धिमान मनुष्य को दान-कार्य में ईश्वा की प्रसन्नता के लिये लगाना चाहिए।

न्यायोपार्जितवितस्य दशमांशेन धीमतः।
कर्तव्यो विनियोगश्च ईश्वर प्रीत्यर्थमेव च।। (स्कन्दपुराण)

अन्नायपूर्ण अर्जित धन का दान करने से कोई पुण्य नहीं होता। यह बात ’न्यायपार्जितवितस्य’ इस वचन से स्पष्ट होती है। दान देने का अभिमान तथा लेने वाले पर किसी प्रकार के उपकार का भाव न उत्पन्न हां, इसके लिये इस श्लोक में ’कर्तव्य’ पद का प्रयोग हुआ हंै अर्थात ’धन का अतना हिस्सा दान करना यह मनुष्य का कर्तव्य है। मानव का मुख्य लक्ष्य है-ईश्वर की प्रसन्नता। अतः दानरूप कर्तव्य का पालन करते हुए भगवत्प्रीत को बनाये रखना भी आवश्यक है। इसीलिये ’कर्तव्यों विनियोगश्च ईश्वरप्रीत्यर्थमेव च’ इन शब्दो का प्रयोग रूपये हों, उनमे से यदि उनसे एक सौ रूपये दान कर दिये तो बचे हुए 900 रूपयों में ही ममत्व और आसक्ति रहेगी। इस प्रगकार दान ममता या आसक्ति को कम करके अन्तः करण की शुद्धिरूप प्रत्यक्ष (दृष्ट) फल प्रदान करता है और शास्त्र-प्रणामनुसार वैकुण्ठलोक की प्राप्तिरूप अप्रत्यक्ष (अदृष्ट) फल भी प्रदान करता है।

देवीभागवत में तो यह स्पष्ट कहा गया है कि अन्याय से उपार्जित धनद्वारा किया गया शुभ कर्म व्यर्थ है। इससे न तो इहलोक में कीर्ति होती है और न ही परलोक में कोई  पारंमार्थिक फल मिलता है-

अन्यायोपार्जितेनैव द्रव्येण सुकृंत कृतम्।
न कीर्तिरिहलोके च परलोके च तत्फलम।।

उपार्जित धन के दशमांश का दान करने का यह विधान सामान्य सामान्य कोटि के मानवों के लिये किया गया है, पर जो व्यक्ति वैभवशाली, धनी और उदारचेता हैं, उन्हें तांे अपने उपार्जित धन का पांच भागों में विभक्त करना चाहिए।

धर्माय यशसेऽर्थाय कामाय स्वजनाय च।
पचधा विभजन् वित्तमिहामुत्र च मोदते ।।

(1) धर्म, (2) यश, (3) अर्थ (व्यापार आदि आजीविका), (4) काम (जीवप के उपयोगी भोग) और (5) स्वजन (परिवार) – के लिये । इस प्रकार पांच प्रकार के धन का विभाग करने वाला इस लोक में और परलोक में भी आनन्द को प्राप्त करता है ।  यहां व्यापार आदि आजीविका के लिये धन का विभाग इसलिये किया गाय है किजिससे जीविका केसपाधनो का विनाश ना हो क्योंकि भागवत में यह स्पष्ट कहा गया है कि जिस सर्वस्व – दान से जीवकिा भी नष्ट हो जाती हो, बुद्धिमान् पुरूष उस दान की प्रशंसा नहीं करते, क्योंकि जीविका का साधन बने रहने पर ही मनुष्य दान, यज्ञ, तप आदि शुभ कर्म करने में समर्थ होता है ।

न तइदानं प्रशसन्ति येन वृहितर्विपद्यते ।
दानं यज्ञस्तपः कर्म लोके वृतिमनो यतः ।।

जो मनुष्य अत्यन्त निर्धन है, अनावश्यक एक पैसा भी खर्च नहीं करते तथा अत्यन्त कठिनाई पूर्वक अपने परिवार का भरण – पोषण कर पाते है ऐसे लोगो के लिये दान करने का विधान शास्त्र नहीं करते ।  इतना ही नहीं यदि पुण्य केलोभ से अवश्य पालनीय वृद्ध माता – पिता का यथा साध्वी पत्नी और छोटे बच्चों का पालन न करके उनका पेट काटकर जो दान करते है उन्हे पुण्य नहीं प्रत्युत पाप की ही प्राप्ति ही होती है ।

शक्त परजने दाता स्वजने दुःखजीविनि ।
मध्वापातो विषादस्वादः स धर्मप्रतिरूपकः ।।

जो धनी व्यक्ति अपने स्वजन – परिवार के लोगो के दुःखपूर्वक जीवित रहने पर उनका पालन करने में समर्थ होने पर भी पालन न कर दूसरों को दान देता है, वह दान मधुमिश्रित विष – सा स्वादप्रद है और धर्म के रूप में अधर्म है ।  पुराणों में दान के सम्बन्ध में तो यहां तक कह दिया है कि जितने में पेट भर जाता है, उतने में ही मनुष्य का अधिकार है, उससे अधिक में जो अधिकार है,वह चोर है, दण्ड का भागी है –

यावद् भ्रियेत जठरं तावत् स्वतत्वं हि देहिनाम् ।
अधिकं योऽभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति ।।

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About the Author: Pushti Mimansa