फळ-द्वितीया कथा – Fal Dyitya ri Katha

इतनी बार देखा गया : 282
4 0
Read Time:17 Minute, 20 Second

अेक समय राजां युधिस्ठिर भगवान स्री किरसण जी सूं परसन करयो कै है जनारदन दान अ’र यग्य बो किसो पुण्य है जिके रे करने सूं राज्य री पिराप्ति होवे ? आप किरपां कर म्हने बताओं। जणे स्री किरसण जी कैह्यो – जिको राजां राज्य रो सुख चावे बिये ने ओ व्रत करणो चाहिजै। इण व्रत करने सूं मन चींत्यों फळ मिले है। अतः ओ व्रतों मांय उतम विरत है अ’र घणोई पुण्य देवण आळो हो। इण अेक विरत रे करण सूं सगळे तीरथां मांय न्हावण रो फळ मिले है।

सुधिस्ठिर जी पूछयो – बो किसो विरत है, किसे देवतां रो है अ’र उण विरत रे करण री     विधि बताओं तद सरी किरसण् कैहवे है – राजन्!  थ्हे सुणो! विरतों मांय ओ उतम विरत है। इण विरत रे बारे मांय सूत जी, सोनकादि रिसियों को बतायी।

पिराचीन काल मांय अेक समय दंडका बनवासी रिसियों रे आने पर सूत जी केहयो – हे रिसी लोगां आप कठै गया हां। ? इण भांत सू जावण रो कांई मतलब है ? तद रिसी बोल्यां – हे सूत! म्हें लोग गंगा जी मांय न्हावण करणने गयां हां। बठै सरी भगवान भी आयां हां। आपरे खने तो अे सून्य-सयनै नावं विरत रे बारे मांय पूछणने आयां हां, जिके रे कारण सूं राजां रूकमांगद री पससिदी (कीर्ति) स्वरग तांई पुगगी। जठै सरी भगवान विराजमान है। जणे सूत जी कैहयो – सावण आद मईने री चार किरसण पख री कि दूज रो बिये वितर करयो। भगवान विस्णु री पूजा करी।

इयेसूं भगवान परसन्न हुय’र मन इच्छा फळ रो वरदान दियो। पछै बिरामण आदि री किरपा सूं राजां हुयो। इये ही कािा ने पूरणरूप सूं कैहवूं हूं:- आप लोग अेक चित हुय’र सुणो। पिराचीन समय मांय राजां रूकमांगद हुयां हां, राजा बड़ा धरमात्मा हां अ’र सगळे राजावां मांय सरेस्ठ मानीजतां हां। अेक दिन राजां ’’नामदेव’’ रिसी’र आसरम मांय आया। बठै अेक रिसी ने बैठया देख्यां। राजा, रिसी ने परणाम करयो, पांव धोक कियो। रिसी ने भी उठ अघ्र्य आदि सूं राजा रो सत्कार करयो। राजां सूं बांकी कुसल मंगल पूछी। राजां बोल्या – हे रिसीदेव! आपरी किरपां सूं म्हारे राज्य में सैं कुसल है, पण म्हे आप सूं कुछ पूछण ने आयो हूं। म्हारे मन मांय कुछ संका है। हे बिरामण देवता, जिके करम सूं म्हने सतरूओं रहित, बैरयां रहित, निसकंटक राज्य पिरापत हुयो, धरमांगद जिसो गुणवान बेटो हुयो, इच्छानुसार ठांव माथे ले जावण आळो घोडो मिल्यों, संध्यावली जिसी आच्छी लुगाई मिली, धरती माथे जिको बराबर गुणवान, सुध चाल चालन आठी पतिवरतां  अ’र कोई है ही कोयनी। अ’र जकी चीजां देवताओं रे वास्ते दुरलभ है, बे सब म्हने मिली। म्हें किसो विरत करयो जिके पुनः सूं इयां बसने प्राप्त करी। राजां रूकमागंद रै पूछणे पर रिसीवर ध्यान लगायो अ’र पलभर में राजां रे लारले जिलम री बात जाणली।

इणरे उपरान्त रिसीवर हंसते हंसते राजां ने कैहवण लागां। हे राजन् – लारले जिलम रे मांय आप अवनीपाल नामक सुदर हां। दरिदरतां रे कारण दुखी हां। थ्हारी लुगाई बुरी ही। बुरे करमां ने करण आळी ही। अेकाअेक थ्हारी संगत अेक आच्छे बिरामण सूं हुई। बो बिरामण अेक इसो बिरामण हो जिको केइ वरसां सूं ’’असून्य-सयन’’ करतो आ रैहयो हो। उणरे परभाव सूं थ्हने भी ओ विरत कियो। उण विरत रो ओ परताप है। थ्हें दो वरसां तांई ओ विरत करयो जके रो ओ फळ है।

सावण री दूज रो विरत करने सूं सम्पति सूं पुत्रों री पिराप्ति हुवे है। आसोज मईणे री दूज रो विरत करणे सूं आच्छे आचरण (चाल-चलण)

आठी लुगाई री प्राप्ति हुवे है। लुगाई अगर ओ विरत करे तो उणने अच्छो गुणवान धणी मिले। लुगाई ओ विरत चंदरोदय व्यापिनी सुक्ल पख री दूज रो करे।

अे वचन सुण’र राजां आपरे नगर आयो। आपरे सैर आय’र ’’असून्य-सयन’’ रो वितर करण लागग्यों। जिके विरत रे बल सूं अकूंत जस अ’र अकूंत बल पिराप्त हुयो। आं कथा पिराचीन समय में सूत जी ने सोनकादि रिसी लोगों के लिए सुणायी। तद रिसीवरों ने दुबारा परसन करयो। हे सूत! ओ विरत किण भांत उत्पन्न हुयो ? इण विरत ने सैं सूं पैला केण करयो ? किण विधि सूं इण विरत ने करणो चाईजै ? इण विरत सूं किसो फल मिले ?

तद सूत जी सौनकादि रिसीयों ने बतावण लाग्यां। घण्े पुराणे समये में भगवान ने मारकण्डेय रिसी ने आपरी माया देखायी। भगवान समुदर, पिरथ्वी अ’र जल सबने जलमय कर ख्ुाद अेक कमल रे पते माथे झूलो बिणाय कर झूले मांय सूयग्यां। रण समय मारकण्डेय ने भगवान सूं परसन करयो। हे बरहमन! आपरी इण भांग कमल रे पते पर सूंवते समय रिक्छा कुण करेला ? आपने कुण आपरे स्तनां सू दूध पिलासी ? आपरो लालन-पालन कुण करसी ? आप कठै सूं जिलम लियो ? हे बालक ! सही सही बात कैहवो।

अबै बालक रे रूप मांय कैहवण लागां – हे रिसी ! अे सब मांय ही उत्पन्न करया है। बिरमा, इन्दर, महादेव आदित्य, रूदर, रिसीवर दिग्पाल, लोकपाल, गन्धरव, नाग, राक्छस, पिशाच, राजां लोग, परवत, विद्याधर, गिरह, पाताल, पिरथ्वी, भूतादि, चतुरदश लोक, नक्छतर, जोग, राशि तारां, जलराशि, वात, अग्नि अ’र भी जड़ चेतन आद सब म्हारे सूं ही पैदा हुयां है। म्हारे मायने ही मिलियोडां रैहवे है। म्हारे द्वारा ही पालन करयो जावे है। हे रिसी ! थ्हूं म्हारी माया जाणे कोयनी, इण रे वास्ते थ्हूं म्हने बालक कैहवे है।

तद मारकण्डेय कैहवण लागां – हे महाराज, म्हे आपरी पैदाइस रे बारे जाणू कोयनी। आपरी महिमा तो कानां सूं सुणी है। इण कारण है देवों के देव ! म्हें आपरां पाठ (स्तरोतर), आपरी किरपां सूं करूंला। सूत जी सौनकादि रे प्रति कहवे है –

इण भांत मारकण्डेय रे कैहवणे माथे भगवान आपरो मुंडों फैलाय’र, उबासी लेने मातर सूं मुनि ने आपरे मुेडे मांय राख लियो। मुंडे मांय जांवता ही रिसी ने भगवान रे पेट मांय भगता-दौडता अेक सो पांच वरस पूरा हुयग्यां। रिसी, धरमात्मां बालक रे पेट में बैठग्यां इण रे पछै म्हे निराश हुय भगवान री पिरारथनां करण लागां। रिसी स्तुति करे है – थ्हूं सब भूत-पिराणियों की माता है, थ्हूं ही पिता है। थ्हूं ही गुरू है। वेदों आदि रो उद्धार करण आळां भी आप ही हो। म्हें आपरे पेट मायं जायकर आपरे पेट सूं ही पान करयो है।

अेक सौ पांच वरस भटक भटक कर आखिर आपरी सरण पायी है। है देव, हे देवों के देव, हे संखधाी, हे चकरधारी, हे गदाधरी आप म्हारी रिक्छां करो। हे लक्छमीपति आप परसन्न हुवो। हे मधुसूदन आप म्हारे पर राजी हुवो हे जगत के नाम, हे गरूड़-ध्वज, हे पुण्डरीकाक्छ, हे जल सायन करने वाले म्हे आपने बारम्बार नमस्कार करूं हूं। आप देवतां अ’र राक्छसों के भरतार हो। मिनखां रो नरक लोक सूं उद्धार करणे आपरे होंवता बिजो कोई समरथवान नीं है।

हे बरहमन रिसी – हूं थ्हारी स्तूती करणे सूं घणी राजी हूं। म्हारे सूं थ्हूं वरदान मांग। थ्हारे मन मांय इच्छां हुवे बाई मांग।

तद मारकण्डेय बोल्या – हे देव, हे चतुरभुज आप म्हारे माथे राजी हो तो आपं असून्य-सून्य विरत री कथां कैहवों। ओ विरत सगळे विरतों मांय उतम है। इण विरत रे करण सूं बेरी सैया कदेई सूनी नीं रैहवे। अरथात बियेरो बड़ो सौभाग्य रेहवे, बां ही कथा कैहवो। भगवान तद कैहवण लागां – ओ विरत म्हे केनेई कैहयो कोयनी। थ्हूं इण विरत ने अेक मन होय’र सुण। संसार मांय ओ विरत विख्यात नीं है, वह म्हें तुम्हें बतलाता हूं। थ्हूं मन लगाय’र सुणना। अच्छे सुभ दिनों मांय इण विरत ने सरू करणो है। जिकी बीज ने चंदरमा उगे बिये बीज ने करणो है। भेर होवण रे पछै आपरे रोज रे काम सूं निबट’र दिन में विरत करणो चाईजै। फेर चंदरमा रे उदय होवण माथे गाय रे गोबर रो चोको लगाय’र चावलां रो अस्ट दल बणाय’र, उण माथे ताम्बे रो पातर धरणो चाईजै। उण पातर मांय सरी लिछमीनाथ जी री मूरति बिराजमान करणी चाईजै। जल मांय जुगति सहित बियेने पधरवणी चाईजै। फेर केसर सूं पूजां करणी चाईज्े। फेर भक्तिमय पूजा कर, घणी-घणी पिरारथनां करणी। हे देव, हे असून्य-सयन, आप म्हाने पुतर, लुगाई, धन-धान्य सूं सम्पन्न कर दो। फेर अगर, कपूर, चंदन,      सुगन्ध आदि रो लेपन करणो है। फेर जाय के फूल, सत-पतर, कमल, मालती, भरंगराज, तुलसी पतर अ’र भी पुस्प भगवान रे अरपण करणां चाईजै। धूप-दीप, नैवेद्य, मुख वास करणो चाईजै। चारों ही द्वितीयाओं ने नये-नये फल चढावणां चाईजै। इण खातर ही इण’न फल द्वितीयां कैहवे है। नांव इण रो ’’असून्य-सयन’’ रो है। फेर दिखणां, पान, आचमन समरपण करणो चाईजै। फेर अरग देणो चाईजै। अेक बरतन मांय, गंध, फूल, सुपारी, अक्छत, लेय’र आ बात कैहवणी चाईजै – हे किरसण रिसीकेस, हे देव, जगत के पिा, आपने म्हे जको अरग समरपण करयो है।, बिये ने आप स्वीकार करो। इती पिरारथनां कर भगवान रे आगे बाने (बरतनां मांय राखोडी गंध, फूल, सुपारी आदि) समरपण कर दो। फेर चंदरमां री पूजा कर चंदरमां ने अरग दो। अरग देवते समय ओ केइवणो चाईजै – छीर सागर मांय उत्पन्न हुयोड़ा, जिसका अभि गोतर मं जिलम, ऐसे हे ससांक (चंदरमा) आप रोहिणी सहित अरग गरहण करो। ऐसे मईने के अंदर अंदर करणां है। काती कईने मांय विधि पूरवक उदयापन करणो है।

तद मारकण्डेय पूछते है वितर किससे करणो है ? किसो त्यागणो है ? दान मांय कांई देवणो चाईजै ? किण भांत उदयापन (किणी विरत रे पूरण होवण रे पछै कियो जावण्सा वाळो करत्य, हवन, बिरामण भोजन व बाने दिखणां आदि) करणो चाईजै ? फल कांय सूं हुवे, जिकी निश्चयपूरवक बताओ। तद भगवान कैहवण लागां – हे रिसी सास्वत भोजन घी, गुड़, सक्कर सहित करणो चाहिजै। दही, छाछ बरजती, गेंहूं, जव खावणां है। आधा बिरामण ने देणां है अ’र आधा आपने खावणां है। विरत रे दिन काम, किरोध, लोभ, मोह, निंदा रो त्याग करणो है।

कथा सुणनी है। इण भांत सूं विरत कर चैथे वरस अथवा सोलवें बरस उदयापन कराणे हैं उदयापन बिना विरत पूरों नी हुवेलां। इण रे वास्ते उदयापन जरूर करणो चाईजै। बिरामण री आग्यां लेय’र सास्तरोक्त विधि सूं करणों चाईजै। छः बिरामणां ने वरणी (माला फेरण वास्ते) बैठावणां चाहिजै। छः नी बैठावण री व्यवस्था हुवे तो चार जरूर बैठावणां चाईजै। गऊदान, लुगाई-मिनख रां कपड़ां, लुगाई-मिनख रां आभूसण, सैयां दान-रजाई, बिछौनां, तकिया आदि अपनी सामथ्रय अनुसार सपत्नीक बिररामण ने देवणी चाहिजै। बिरामण सोलह भोजन खीर-खांड सूं दिखणां समेत, अेक आपरी सक्ति सारू दूध सूं भरियोडों सोने रो कळस, मायने सोने री रूपियों, उपर सूं पीले कपड़े सूं बांध’र बिरामण ने जको वैस्णव हुवे, कुटुम्बी हुवै, लुगाई हीण नीं हुवै, तपस्यां करण आळो हुवे, विध्यां पातर हुवे, बिये ने ही देवणो चाईजै। सोने रो कळस देवण री सामथ्रय नीं होवे तो ताम्बे रो अथवा मिट्टी रो घडों ही देवणों चाईजै। इण रे पछे आप ख्ुाद भोजन करे। राजी मन सूं चार वरस तांई इण भांत विरत करे अ’र इसी भांत उदयापन करतां रैहवे।

स्री किरसण जी कैवे – हे युधिस्ठिर, जिको मिनख इण भांत व्रत करे उण ने फळ जरूर मिले। जिको मिनख सुणे, उण ने सूरय गिरण रे मांय जाय’र पितर तरपण रे बराबर पुण्य लाभ मिले। जिको मिनख गया जाय’र पितर सिराध करे, गिलिकां मांय जाय’र न्हावण करे, बो मिनख उणी पुण्य रे फल ने भोगने आळो हुवे। मथुरा मंडल मांय जाय’र पंचभीसम जाय’र जिको मिनख भगवान रे आगे जागरण करे, बिसे ही फल री पिरापति हुवे। मथुरा में परबोधनी रो जागरण करने सूं, नेमीसारण्यच में गंगासागर, गंगा में, हरिद्वार में, सिंधु के पंचनद में, गोदावरी नदी में, बिरहस्पति सिंह राशि में हो तद, बदरीका आसरम में, केदारनाथ में जाय’र किणी मिनख ने सोने रो दान करे अथवा पिरथवी दान करण आळे ने जिको पुण्य लाभ मिले उणी भांत रो फल भोगणे आळो हुवे। जल-सयन भगवान के पूजन करने पर बियने फल मिय जावे। जिको मिनख विधि विधान, विधि पूरण इण विरतों में उतम विरत को करता हैं वह यम लोक मेें नहीं जाता। जै बिरामण करे तो उण ने ग्यान लाभ, राजां करे तो बियने राज्य लाभ मिले, लुगाई करे तो सात जन्म जन्मान्तर तांई   विधवा नीं हुवे अ’र घणे धन-धान्य, घणां ही पुतर-पोतर आळी होवे। उन्हें भाईयों का सुख मिले। इण विरत ने करणे सूं अ’र घणे सारे मन चींत्यों फल मिल जावे इण भांत सूत जी सोनकादि रिसीयों ने कैहयो। मारकण्डेय रिसी को भगवान ने ओ विरत करणे रो कैहयो। इण’ने करण सूं संसार विख्यात हुयग्यों। सोनकादि आ बात सुण’र आपरे आसरम को गये। राजां युधिस्ठिर ने भगवान सरी किरसण रे मुंडे सूं ओ महात्म्य सुण पांचू भाई अ’र दरोपदी रे साथे इये ’’असून्य-सयन’’ रो वितर कियो, जिके सूं वनवास काल में इये ही विरत रे परताप सूं संताप दूर रैहयो। अपने सतरूवों को विजय कर, निस्कंटक राज्य पिरापत करियो।

’’इति स्री फळ-द्वितीया कथा’’

संकलन:- भगवान दास स्वामी

Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleepy
Sleepy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %

Recommended For You

About the Author: Pushti Mimansa