रक्त दान – Rakt Daan

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भारत में दान को सदैव सर्वोपरि माना गया है। कबीर ने कहा है- कर साहिब की बंदगी और भूखे को दो अन्न। प्राचीनकाल से ही दान की महत्ता को दानवीर कर्ण द्वारा कुण्डल तथा कवच का दान, शिवाजी द्वारा गुरू रामदास का अपना राज्य दान करने के बाद गुरू की धरोहर समझकर शासन सभालना, संत विनोबा भावे द्वारा भूदान यज्ञ (जरूरत से ज्यादा भूमि रखने वालों से अतिरिक्त भूमि दान में लेकर जरूरतमंदों को देना), भगत सिंह, जैसे – स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा प्राणदान, सत्यवादी हरिश्चन्द्र, सेनानियों द्वारा प्राणदान, सत्यवादी हरिश्चन्द्र द्वारा राजपाट के साथ – साथ स्वंय का दान, महान् असुर राजा बलि द्वारा वामन रूप में भगवान विष्णु को दो पग में भूलोक तथा स्वर्गलोक और तीसरे पग में स्वंय के सिर पर रखवाकर स्वंय का दान जैसे अनेक महनीय आख्यान भारतीय इतिहास की धरोहर है ।  बाईबल में भी गुप्तदान अर्थात् दायां हाथ दाने करे तथा बांये को पता ही नहीं चले, का उल्लेख है ।  पहले के राजा – महाराज ऋषियों, सन्तों तथा ब्राह्यमणो को गौ एंव धनदान दिया करते थे, जिससे उनका जीवनयापन होता था। नगरों में साथ-साथ जगह-जगह कुएँ खुदवाये थे। महाराज अग्रसेन द्वारा वैश्य समाज के प्रत्येक परिवार से एक ईट तथा एक रूपये के दान को कहा था कि हर आने वाले नये परिवार को एक ईट एवं एक रूपये का दान दो तो इससे नवागन्तुक का घर बन जायगा तथा आर्थिक सहायता से वह अपने परिवार का पालन-पोषण कर लेगा एवं कारोबार शुरू कर सकेगा।

दान करके मनुष्य परोपकार के साथ-साथ स्वका भी उपकार करता है। क्योकि इससे जरूरत मन्दो की भलाई के साथ-साथ आत्मिक सन्तुष्टि मिलती है परोपकार का ही कार्य करती है। यह शरीर भी परोपकार के लिये ही है, स्वार्थ के लिये नही-

रक्तदान मानव जीवन में किया गया एक पुनीत कार्य है, जिसमें रक्त की कमी से मृत्युशय्या पर बड़े यत्नो तथा शुभकर्मो से उक बार ही मिलता है। रक्तदान से किसी की भी जिन्दगी बच सकती है तथा स्वयं को भी कभी रक्त की जरूरत पड़ सकती है। रक्त का कोई विकल्प नहीं होता एवं न ही यह कृत्रिम रूप से तैयार हो सकता है। अतः हर मनुष्य को जानवरो का रक्त भी नहीं चढ़ाया जा सकता। अतः हर मनुष्य को अपने जीवनकाल में रक्तदान जैसा महान कार्य अवश्य करना चाहिये। रक्तदान से सम्बधित कुछ भ्रान्तियो को दूर करके सत्यता जानना तथा रक्तदान करना बहुत जरूरी है-

  1. रक्तदान से कोई कमजोरी नही होती और न ही इससे मृत्यं होती है। क्योंकि हर मनुष्य के शरीर में 5 लीटर से 5.5 लीटर रक्त होता है। जिसमें से सिर्फ 35-400 मिली. रक्त निकाला जाता है। अगर इतने रक्त के निकालने से मृत्यु सम्भव होती तो महिलाएँ मासिक स्राव के बाद ही मृत्यु का ग्रास बन जाती है।
  2. 17 वर्ष से ज्यादा एंव 65 वर्ष से कम एवं 45 किलो से अधिक का कोई भी व्यक्ति रक्तदान कर सकता है। (एड्स पीलिया एवं कैसर से पीडित को छोडकर)
  3. हर व्यक्त् साल में 3-4 बार यह हर महीने में एक बार रक्तदान कर सकता है।

रक्तदान के लिये रक्त ब्लड बैंक में ही निकाला जाता है और ब्लड ग्रुप इत्यादि चेक करने के बाद रक्त की बोतल में 50 एम. एल. दवा जो खून जमने ना दे डाल दी जाती है, जिसे डाॅक्टर रोगी को अस्पताल दर्शाया जाता है कि रक्त देने वाला तथा लेने वाला पास-पास लेटे हुए हैं तथा एक का रक्त डायरेक्ट दूसरे के शरीर में चढ़ायाजाता रहा है, वह गलत एवं भ्रामक चित्रण है ।  न तो ऐसे रक्त लिया जाता है और ना ही चढाया जाता है ।

रक्तदान – जैसे पुनीत कार्यके लिये अपना ब्लड गु्रप जानकर रखे रक्त देने या लेने की जरूरत कभी भी पड़ सकती है ।  रक्तदान करके मानवीय सेवा मंे योगदान करें  ।

वास्तव में अन्न, जल, धन, भूमि, गौर इत्यादि का दान हो या रक्तदान हो, दान का मनुष्य जीवन में एक खास महत्व है । दान से एक तरफ जरूरतमन्द का भला होता है तो दूसरी तरफ दान देने वाले को आत्मसंतुष्टि के साथ – साथ कर्मफल सिद्धान्त के अनुसार इस लोक एवं परलोक दोनो में सुख मिलता है, अतः जीवन में दान अवश्य करना चाहिये ।  रामधारी सिंह ‘दिनकरजी‘ ने सही कहा है –

दान जगत का प्रकृत धर्म है, मनुज व्यर्थ डरता है,
एक रोज तो हमें स्वंय, सब कुछ देना पड़ता है ।
बचते वही समय पर, जो सर्वस्व दान करते है,
ऋतु का ज्ञान नहीं जिनको वे देकर भी मरते है ।

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About the Author: Pushti Mimansa