तीर्थगुरू पुष्करराज – Tirthguru PushkarRaj

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जिस प्रकार देवताओं में पुरूषोŸाम सर्वश्रेष्ठ हैं। वैसे ही तीर्थों में पुष्कर आदि तीर्थ है –

यथा सुराणां सर्वेषामादिस्तु पुरूषोŸामः।
तथैव पुष्करं राजंस्तीर्थानामादिरूच्यते।।

इसे सिद्धतीर्थ माना गया है। कहते हैं-पुष्कर में जाना बड़ा कठिन है (बड़े सौभाग्य से होता है)। पुष्कर में तपस्या दुष्कर है। पुष्कर में दान भी दुष्कर है और वास करना तो और भी दुष्कर बताया गया है –

दुष्करं पुष्करं गन्तुं दुष्करं पुष्करे तपः।
दुष्करं पुष्करे दानं वस्तुं चैव सुदुष्करम्।।

यह भी कहा गया है कि कोई सौ वर्षों तक लगातार अग्निहोत्र की उपासना करे या कार्तिक पूर्णिमा की एक रात पुष्कर तीर्थ में वास करे – दोनों का फल समान है –

यस्तु वर्षशतं पूर्णमग्निहोत्रमुपाचरेत्।
कार्तिकीं वा वसेदेकां पुष्करे सममेव तु।।

सिद्धतीर्थ पुष्करराज की जयघोष के साथ इन पर्वों की विशिष्टताएं समापन होती हैं। राजस्थान के विशेष रूप से ग्रामीण जनता के मानस में पुष्कर पर्व – मेला विशेष स्थान रखता है।

’पद्मपुराण’ के अनुसार सृष्टि के आदि में पुष्कर तीर्थ के स्थान में वज्रनाभ नामक एक राक्षस रहता था। वह बालकों को मार दिया करता था। उसी समय ब्रह्मा जी के मन में यज्ञ करने की इच्छा जाग्रत हुई। वे भगवान् विष्णु की नाभि से निकले कमल से जहां प्रकट हुए थे, उस स्थान पर आये और वहां अपने हाथ के कमल को फेंककर उन्होंने उस वज्रनाथ राक्षस को मार दिया। ब्रह्माजी के हाथ का कमल जहां गिरा था, वहां सरोवर बन गया, यही पुष्करतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध हुआ, उसे पुष्कर कहते हैं।

चंद्र नदी के उŸार, सरस्वती नदी के पश्चिम, नंदन स्थान के पूर्व तथा कनिष्ठ पुष्कर के दक्षिण के मध्यवर्ती क्षेत्र को ब्रह्माजी ने यज्ञवेदी बनाया। इस यज्ञवेदी में उन्होंने ज्येष्ठ पुष्कर, मध्य पुष्कर तथा कनिष्ठ पुष्कर – ये तीन पुष्करतीर्थ बनाये। ब्रह्माजी के यज्ञ में सभी देवता तथा ऋशि पधारे। ऋषियों ने आस-पास आश्रम बना लिये। भगवान् शंकर भी कपालधारी बनकर वहां पधारे।

यज्ञारम्भ में सावित्री देवी ने आने में देर की। यज्ञ-मुहूर्त बीता जा रहा था। इसलिये ब्रह्माजी ने गायत्री नाम की एक गोपकुमारी से विवाह करके उन्हें यज्ञ में साथ बैठाया। जब सावित्री देवी आयीं तब ब्रह्माजी के पाश्र्वभाग में गायत्री को देख वे रूष्ट हो गयीं। वे पास के ही एक पर्वत-शिखर पर जाकर दूसरा यज्ञ करने लगीं। कहा जाता है कि यहीं भगवान् वाराह ब्रह्माजी की नासा छिद्र से प्रकट हुए। अतः इन तीन पुष्कर तीर्थों के अतिरिक्त ब्रह्माजी, वाराह भगवान, कपालेश्वर शिव, पर्वत पर सावित्री देवी और ब्रह्माजी के यज्ञ के प्रधान महर्षि अगस्त्य – ये सभी इस क्षेत्र के मुख्य देवता हैं।

जैसे प्रयाग तीर्थो के राजा के रूप में ’तीर्थराज’ नाम से प्रसिद्ध है, वैसे ही पुष्कर तीर्थों के गुरू माने जाते हैं। इस तीर्थ को पुष्करराज भी कहते हैं। पुष्कर की गणना पंच तीर्थों में भी है। पंच तीर्थ इस प्रकार हैं पुष्कर, कुरूक्षेत्र, गया, गंगाजी और प्रभास। पंच सरोवरों में भी पुष्कर की गणना है। पंच सरोवर इस प्रकार है – मानसरोवर, पुष्कर सरोवर, बिन्दुसरोवर, नारायण सरोवर तथा पम्पासरोवर।

राजस्थान के अजमेर शहर से सात मील की दूरी पर पश्चिम में पुष्कर तीर्थ स्थित है। जहां राजमार्ग द्वारा जाया जाता है। पुष्कर के किनारों पर गौ घाट, ब्रह्मघाट, कपाल मोचन घाट, यज्ञ घाट, बदरी घाट, राम घाट और कोटि तीर्थ आदि घाट पक्के बने हैं। पुष्कर सरोवर से सरस्वती नदी का उद्गम है, जो साबरमती से मिलने के बाद लूनी नदी कही जाती है।

पुष्कर सरोवर तीन हैं – ज्येष्ठ (प्रधान) पुष्कर, मध्य (बूढ़ा) पुष्कर और कनिष्ठ पुष्कर। ज्येष्ठ पुष्कर के देवता ब्रह्माजी, मध्य पुष्कर के देवता भगवान् विष्णु और कनिष्ठ पुष्कर के देवता रूद्र हैं। पुष्कर का मुख्य मंदिर ब्रह्माजी का हैं। यह सरोवर से थोड़ी दूर ही है। मंदिर में चतुर्मुखी ब्रह्माजी, दाहिनी ओर सावित्री देवी, बायीं ओर गायत्री देवी का मंदिर हैं। पास में एक ओर सनकादि मुनियों की मूर्तियां हैं। एक छोटे से मंदिर में नारद जी की मूर्ति विराजित है। एक अन्य मंदिर में हाथी पर सवार कुबेर जी की मूर्ति है। ब्रह्मा जी के मंदिर के अतिरिक्त वाराह-मंदिर, आत्मेश्वर महादेव-मंदिर मुख्य मंदिरों में हैं। इसे कपालेश्वर या अटपटेश्वर महादेव भी कहते हैं। इसके अतिरिक्त श्रीरंगजी का मंदिर दर्शनीय है। यात्री पुष्कर की परिक्रमा करते हैं। इस परिक्रमा में श्रीवल्लभाचार्य महाप्रभु की बैठक भी आ जाती है जो सरोवर के दूसरे किनारे पर है। पुष्कर के पास शुद्धवापी नामक गया कुण्ड है। जहां लोग श्राद्धकर्म करते हैं।

पुष्कर सरोवर के एक ओर एक पर्वत के शिखर पर सावित्री देवी और दूसरी ओर दूसरे पर्वत शिखर पर गायत्री मंदिर है। यह गायत्री पीठ 41 शक्ति पीठों में से एक है। यहां सती का  मणिबंध गिरा था।

पुष्कर तीर्थ से कुछ दूर यज्ञ पर्वत है, जिसके पास अगस्त्य ऋषि का आश्रम एवं अगस्त्य कुण्ड है। पुष्कर में स्नान करके अगस्त्य कुण्ड में स्नान करने से ही पुष्कर की यात्रा पूर्ण मानी जाती है। यज्ञ पर्वत के ऊपर से निकलते जल स्त्रोत का उद्गम पवित्र माना गया है। उसका दर्शन ही पापनाशक है। यहां गोमुख से पानी गिरता है। यज्ञ पर्वत के नीचे एक स्थान पर नागतीर्थ एवं नागकुण्ड है। नागपचंमी को नागकुण्ड में स्नान करने का बड़ा महत्व है। यहीं पर नागकुण्ड, चक्रकुण्ड, सूर्यकुण्ड और गंगाकुण्ड हैं।

पुष्कर में सरस्वती नदी में स्नान का बड़ा भारी महत्व है। यहां सरस्वती-सुप्रभा, कांचना, प्राची, नंदा और विशालिका – इन पांच नामों से बहती है।

ज्येष्ठ (प्रधान) – पुष्कर से दो मील दूर मध्य (बूढ़ा) पुष्कर तथा कनिष्ठ पुष्कर है। मध्य पुष्कर सरोवर विशाल और गहरा है। उसके एक किनारे घाट बना है। पुष्कर तीर्थ की चार परिक्रमा-पहली अन्तर्वेदी-छः मील की, दूसरी मध्यवेदी-दस मील की, तीसरी प्रधानवेदी-चैबीस मील की एवं चैथी बहिर्वेदी-अड़तालीस मील की हैं इन परिक्रमाओं में ऋषि-मुनियों के आश्रम-स्थल सम्मिलित हैं। पुष्कर से लगभग बारह मील दूर प्राची, सरस्वती और नंदा नदियों का संगम है। पुष्कर के पास नागपर्वत पर अनेक गुफाएं हैं। जिनमें भर्तृहरि की गुफा एवं भर्तृहरिशिला दर्शनीय हैं।

कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक पुष्कर में मेला लगता है। लोग कार्तिक पूर्णिमा पर पुष्कर-स्नान को सर्वाधिक पुण्यप्रद मानते हैं। पुष्कर-मेले में हजारों यात्री सम्मिलित होते हैं।

कार्तिक पूर्णिमा पर्व के अतिरिक्त श्रावणमास में श्रीरंगजी के मंदिर में हिण्डोलो की झाँकी का आयोजन किया जाता है। जन्माष्टमी का उत्सव बड़ी धूमधाम से श्रीरंगजी के मंदिर में सम्पन्न होता है।

– श्रीकांता व्यास ’बेटी जी’

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