त्रिफला के फायदे – Triphla ke Fayde

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त्रिफला घटक-

हरड बहेडा आँवला प्रत्येक 1-1 भाग लेकर सुक्ष्म चूर्ण करके सुरक्षित रख ले। चार माह की अवधि बीत जाने पर बना हुआ चूर्ण काम में नहीं लेना चाहिये। मात्रा और अनुपात 3-6 ग्राम गर्म जल, दूध के साथ। विधिवत् प्रातः बिना कुछ खाये पीये ताजे पानी के साथ एक बार लेना चाहिए। उसके बाद एक घंटे तक कुछ खाना – पीना नहीं चाहिए। कितनी मात्रा में यह लिया जाये इसका भी विधान है। जितनी उम्र हो उतनी ही रत्ती लेना चाहिए। परन्तु एक बात का ध्यान रहे कि इस त्रिफल के सेवन से एक या दो पतले दस्त होंगे किन्तु इससे घबराना नही चाहिए।

  • श्रावण और भाद्रपद यानी अगस्त और सितम्बर में त्रिफलो को सेधा नमक के साथ लेना चाहिये। जितना त्रिफला का सेवन करें सेंधा नमक उससे छठा हिस्सा लें।
  • आश्विन और कार्तिक यानी अक्टुबर तथा नवम्बर में त्रिफला को शक्कर या चीनी के साथ त्रिफला की खुराक से छठा भाग मिलाकर सेवन करना चाहिये।
  • मार्गशीर्ष और पौष यानी दिसम्बर तथा जनवरी में त्रिफला को लैण्डी पीपल के चूर्ण के साथ सेवन करना चाहिए। यह चूर्ण त्रिफला की मात्रा के छठे भाग से कम हो।
  • माघ तथा फाल्गुन यानी फरवरी और मार्च में त्रिफला को लैण्डी पीपल के चुर्ण के साथ सेवन करना चाहिए। यह चूर्ण त्रिफला की मात्रा के छठे भाग से कम हो।
  • चैत्र और वैशाख यानी अप्रैल और मई में त्रिफला का सेवन त्रिफला के छठा भाग जितना शहद मिलाकर करना चाहिए।
  • ज्येष्ठ तथा आषाढ़ यानी जून और जूलाई में त्रिफला को गुड़ के साथ लेना चाहिए। जो व्यक्ति इस क्रम और विधी से त्रिफला का सेवन करता है। उसका एक प्रकार से काया-कल्प हो जाता है।

पहले वर्ष में यह तन की सुस्ती, आल्यस्य आदि को दूर करता है। दूसरे वर्ष में व्यक्ति सब प्रकार के रोगों से मुक्ति पा लेता है अर्थात सारे रोग मिट जाते है। तीसरे वर्ष में नैत्र ज्योेति बढ़ने लगती है। शरीर कान्ति तथा ओज से ओतप्रोत रहता है। पाँचवे वर्ष में बुद्धि का विशेष विकास होने लगता है। छठे वर्ष में शरीर बलशाली होने लगता है। सातवें वर्ष में वृद्धता तरूणाई में बदलने लगती है। नवें वर्ष में व्यक्ति की नेत्र-ज्योति विशेष शक्ति सम्पन्न हो जाती है। दसवें वर्ष में व्यक्ति के कण्ठ पर शारदा को वाक्-सिद्धि की प्राप्ति हो जाती है। इस प्रकार बारह वर्ष तक निरन्तर उपर्युक्त विधि से त्रिफला का सेवन बन जाता हैः क्योंकि उसकी समस्त मनोवृतियां स्वस्थ तथा सात्विक हो जाती है।

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About the Author: Pushti Mimansa